ज्योतिष क्या है और क्या ज्योतिष अंध विश्वास है?

ज्योतिष क्या है?

ज्योतिष शास्त्र ग्रहों, नक्षत्रों, राशियों आदि के मानव पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन शास्त्र है। दूसरे शब्दों में ज्योतिष को ‘ समाजिक ब्रह्मांडीय शास्त्र ‘ भी कह सकते हैं। ज्योतिष समय और मानव के आर पार देखने की कला है। इससे भूत वर्तमान और भविष्य तीनों को जाना जा सकता है, और मनुष्य के व्यक्तित्व, स्वभाव, प्रकृति गुण – दोष रोग विकार आदि को भी ठीक-ठाक जाना जा सकता है। ज्योतिष विज्ञान करीब 3000 साल से ज्यादा पुराना विज्ञान है। ज्योतिष के संबंध में समाज अनेक भ्रांतियों को शिकार है ज्योतिष को ठीक-ठाक समझने के लिए मात्र परिभाषा या शब्दार्थ पर विचार करना पर्याप्त नहीं है। अपितु इस विषय में विस्तृत गहन चर्चा और इस संदर्भ में पनपी भ्रांतियों का खंडन भी आवश्यक है।solar system statics

 मात्र कर्मकांड व पंडों की आजीविका?

ज्योतिष मात्र कर्मकांड नहीं है। यह विज्ञान, कला, गणित, खगोल, समाजशास्त्र, आचार संहिता, दर्शन, तथा अध्यात्म का अनूठा संगम है। यह ठीक है कि बहुत से विद्वानों की आजीविका का भी यह साधन है। पर इसमें आपत्तिजनक क्या है? कानून का जानकार वकालत द्वारा आजीविका चलाता है। चिकित्सा विज्ञानी डॉकटर बनकर आजीविका चलाता है। किसी भी विषय का जानकार उस विषय के उपयोग से दूसरों को लाभान्वित करके आजीविका चलाता है। वह अकाउंटेंट हो, वैज्ञानिक हो, संगीतज्ञ हो, कलाकार हो, गणितज्ञ हो, अध्यापक या भाषाविद हो, मैकेनिक हो, इंजीनियर हो, वकील हो, मनोवैज्ञानिक हो या खिलाड़ी आदि। फिर यदि कुछ ज्योतिर्विंद ज्योतिष को आजीविका का साधन बनाते हैं तो इसमें आपत्ति कैसी ?

ऐतिहासिक तथ्य

आकाशीय ज्योतियों से संबंध रखने वाला शास्त्र खगोल शास्त्र(Astronomy) हैं और उनके मनुष्य पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करने वाला शास्त्र ज्योतिष शास्त्र(Astrology) हैं। अतः दोनों एक दूसरे से गहन रूप से जुड़े हैं। यदि हम ज्योतिष को तथा जानना चाहते हैं तो थोड़ा बहुत गोल को भी जाना होगा। खगोल शास्त्र का प्रारंभ सर्वप्रथम किस काल में हुआ, कहना बहुत कठिन है। परंतु इतना तय है कि यह शास्त्र कम से कम 5000 वर्ष पुराना तो अवश्य ही है। क्योंकि भारत में वैदिक काल से ही इस शास्त्र की जड़ें फैली हुई हैं। यजुर्वेद में नक्षत्र दर्शन का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में सांकेतिक ढंग से खागोलविज्ञान के सूत्र मिलते हैं। छांदोग्य उपनिषद में नक्षत्र विद्या का वर्णन मिलता है। बाद में ग्रंथों में तो खगोल, ज्योतिष, एवं मौसम विज्ञान, आदि का विस्तृत ज्ञान प्रचुरता से उपलब्ध होता है। 

सूर्य और चंद्र के कारण हमें काल मापन की दो संभावित इकाइयां प्राप्त होता है- दिन व महीना। काल मापन की तीसरी महत्व इकाई सूर्य एवं पृथ्वी के कारण प्राप्त होती है- वर्ष। एक ऋतु के शुरू होकर पुनः उसी ऋतु में लौटने से वर्ष पूर्ण होता है।बेबीलोनिया में वारों को नाम दिए तो आर्यों ने रवि मार्ग में विभाग कल्पित कर नक्षत्रों की व्यवस्था की। इतिहासकारों के अनुसार राशि विभाग बेबीलोन की खोज है और नक्षत्र विभाग भारत की। ज्योतिष गणना में सूर्य को आधार मानकर रविमार्ग को 12 बार भागों में विभक्त करने से राशिचक्र का निर्माण हुआ है और चंद्र को आधार मानकर रविमार्ग को 27 भागों में विभक्त करने से नक्षत्रचक्र स्थापित हुआ। भारतीयों ने महीनों के नाम भी नक्षत्रों के आधार पर रखें। इससे सिद्ध होता है कि महीनों के नामकरण से पूर्व भारतीय विज्ञान नक्षत्रों की इजात कर चुके थे।

भारतीय वैज्ञानिक खगोल शास्त्र का आरंभ आर्यभट्ट से माना जाता है।इससे पूर्व खगोल संबंधी तथ्य या तो अपने होते हैं या बहुत प्रतीकात्मक। (आर्यभट्ट 23 वर्ष की आयु में ही खगोल विद बन गए थे।) आर्यभट्ट के अतिरिकत भारत का दूसरा समर्थ खगोलविद वराहमिहिर को माना गया है। खगोल के अलावा ज्योतिष में फलित सूत्रों के लिए भी वराह मिहिर का अत्यधिक महत्व है। बाद में ब्रह्मगुप्त नामक प्रकांड खगोलविद भारत में हुआ जिसने वर्षमान की। शुद्धि की ब्रह्मगुप्त को ‘ गणकचक्र चुरामणि ‘ कहां गया था। इसके बाद भारतीय सिद्धांतकारों में प्रमुख भास्कराचार्य (12वीं सदी), गणेश देवज्ञ (16वी सदी), तथा राजा जयसिंह (18वी सदी) आदि हुए।उमर खय्याम जिसे लोग रूबाइयों के शायर रूप में जानते हैं, बहुत बड़ा गणित तथा समर्थ खगोल शास्त्री भी था। बीजगणित की रचना उमर खय्याम ने ही की थी। राजा जयसिंह के बाद भारतीय खगोल शास्त्रियों में कोई समर्थ विद्वान नहीं हो पाया और यूरोप आदि देश बाजी मार ले गए। यहाँ और पढ़ें…

क्या ज्योतिष अंध विश्वास है?

विज्ञानवादियों एवं आधुनिक लोगों का कि यह आम धारणा है कि ज्योतिष अंधविश्वास और केवल पंडितों की कमाई का धंधा है। लेकिन यह भी सत्य है कि ऐसी धारणा उन्‍हीं सज्जनों की है, जिन्होंने ज्योतिष को पढ़ा या जाना नहीं है, मात्र सुना ही है। किसी प्रणाली को जाने वह समझे बिना ही उसका विरोध मात्र इसलिए करना कि वह प्राचीन है अथवा आध्यात्मिकता से संबंधित है, बुद्धिमता नहीं है। दो पदार्थों/ सताओं/ विषयों काे तत्वतः जानकर उनके संबंध में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके ही हम उनकी तुलना कर सकते हैं। तभी हम किसी को श्रेष्ठ और किसी को औसत या निम्न कहने की अधिकारी है । मात्र इसलिए नहीं कि वह हमें पसंद नहीं है या हमारी रुचि के अनुकूल नहीं है। सत्य हमेशा हमारी पसंद का ही हो, यह जरूरी नहीं है।

  ज्योतिष मात्र कल्पना है?

कल्पना में मात्र विलास होता है। उसके निष्कर्ष कुछ नहीं निकलते। अतः कल्पना निराधार होती है, क्योंकि वास्तविकता से उसका संबंध नहीं होता। परंतु ज्योतिषीय सूत्र सहज ही जातक के जन्म का समय, मास, पक्ष आदि बताते हैं। जातक का व्यक्तित्व, गुण, दोष, रंग, आकार आदि बताते हैं, यहां तक कि वह किन रोगों से ग्रस्त/ पीड़ित है? उसका दांपत्य जीवन कैसा है? बच्चे कितने हैं? बच्चों का लिंग तथा गुण, स्वभाव क्या है? जातक व उसके बच्चों की शिक्षा क्या है? जातक के माता-पिता, भाई- बहनों आदि की स्थिति क्या है? यह सब निष्कर्ष सत्यता के साथ उद्घाटित करते हैं। जातक के भूतकाल भविष्यत् काल के संबंध में भी एक सटीक अनुमान ज्योतिषी लगा पता है। फिर इसे कल्पना कैसे मान सकते हैं।

जो पुराना है वह मूल्यवान है लेकिन हमेशा नहीं।

किसी विषय, वस्तु, ज्ञान अथवा सिद्धांत को मात्र उसकी पुरातनता के आधार पर नहीं अपना लेना चाहिए और न ही मात्र उसके प्राचीन होने कारण उसे त्याग देना चाहिए। यदि हम मात्र परंपरा या प्राचीनता के आधार पर ऐसा करेंगे तो हमारे ‘पढ़े-लिखे बेवकूफ़’ होने का सबूत होगा।कहावत है कि OLD IS GOLD लेकिन साथ में यह भी ध्यान रखें NOT ALWAYS (यानी जो पुराना है और मूल्यवान है परंतु हमेशा नहीं)। क्योंकि ‘हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती’ अतः यह भी मान लेना मूर्खता ही होगी कि हर नई वस्तु सोना ही होगी/मूल्यवान ही होगी। मूल्य या महत्व का आधार उसकी उपयोगिता और औचित्य है न कि उसका पुराना या नया होना। अगर हमारे पूर्वज कुछ गलत करते रहे हैं तो इसी आधार पर हम भी गलत को नहीं अपना सकते कि हमारे पूर्वज भी ऐसा ही करते रहे हैं,इसलिए हम भी ऐसा करेंगे। इसी प्रकार यदि कोई नई प्रणाली या नियम निकमा साबित हो रहा है तो भी मात्र उसके आधुनिक या नवीन होने के कारण ही उसका स्वागत भी नहीं किया जा सकता। सतर्क एवं निष्पक्ष मूल्यांकन के बाद जो उपयोगी व उचित सिद्ध हो वहीं अपनाए जाने योग्य है। भले ही परंपरागत /प्राचीन हो अथवा नूतन /आधुनिक जैसे पहले भी कहा है कि अंधा विरोध या अंधा समर्थन दोनों मूर्खता है। सजगता प्राथमिकता है।

यदि हम परंपरा की ही टांग पकड़ कर लटकते तो बस भटके ही रहते।अरस्तु से गैलिलियों, गैलिलियों से न्यूटन और न्यूटन से आईऩस्टीन तक हमारे सिद्धांत व दृष्टिकोण विकसित ना हुए होते तो अतः अंधानुकरण से बचिए। भले ही वह परंपराओं का हो, भले ही वह अधुनिकता का हो। यह बात कुछ छोटे व्यवहारिक उदाहरणो द्वारा और स्पष्ट की जा सकती है।

मुस्लिम धर्म अरब (रेगिस्तानी क्षेत्र) से आरंभ हुआ। पानी सुविधापूर्वक उपलब्ध ना होने से टोटी / नलकीदार लोटा तब प्रयोग में लाया गया (ताकि पानी का अपव्यय ना हो) तथा वही लोटा नमाज, रसोई, स्नानगर व शौचालय में प्रयुक्त किया गया। ‘वजू’ भी (उल्टे हाथ धोना) स्थान के स्थान पर, नमाज से पूर्व प्रयोग में लाया गया। गर्मी या सूर्य को सामने से ना झैलना पड़े, अतः पश्चिम दिशा में मुख करके नमाज पढ़ने का प्रवाधान किया गया।हफ्ते में एक बार वस्त्र धोने या गुसल की व्यवस्था बनाई गई। यह सब उस समय की मजबूरी थी। तब की परिस्थितियों के अनुसार उपयोगी था । परंतु आज ऐसा नहीं है। फिर भी हम मात्र रूढ़िवादी होने के कट्टरता कारण इन नियमों का अनुकरण करते हैं तो हमारे शिक्षित व विकसित होने का क्या लाभ?

सायंकाल के बाद झाड़ू लगाने से लक्ष्मी घर से चली जाती है। यह सिद्धांत जब बनाया गया तब रोशनी की उचित व्यवस्था नहीं थी। अंधेरे में या दीपक की रोशनी में झाड़ू लगाने से कूड़े के साथ नीचे गिर गई कोई मूल्यवान चीज भी बाहर फेंकी जा सकती थी। तब के लिए यह सिद्धांत ठीक था। मगर आज रोशनी की समुचित व्यवस्था होने पर आवश्यकता पड़ने से शाम या रात को झाड़ू क्यों नहीं लगाई जा सकती? (इसका अर्थ यह नहीं है कि रूढ़िवादिता को तोड़ने के लिए हम रात को ही झाड़ लगाएं। क्योंकि प्रातः काल ही घर तथा अपनी साफ सफाई कर लेनी चाहिए। सारा दिन गंदगी में काटकर रात को सफाई करना तो निरी बेवकूफी है। मगर इसका अर्थ यह अवश्य है कि जरूरत पड़े तो रात में भी पूनः सफाई की जा सकती है।ऐसा नहीं है कि सुबह यदि सफाई किसी कारण ना हो सकी या पुनः गंदगी हो गई तो शाम ढल जाने कारण गंदगी में ही पड़े रहे, सफाई न करें, क्योंकि हमारी रूढ़ी इसका समर्थन नहीं करती ।

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